नेपा दर्पण / संपादकीय कॉलम
रक्षाबंधन केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और आत्मीयता का प्रतीक है। इस पवित्र पर्व पर मिठाइयों का विशेष महत्व रहता है। घर-घर मिठाइयां पहुंचती हैं, बाजार सजते हैं और मांग सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन इसी बढ़ी हुई मांग के बीच यदि मुनाफाखोरी और मिलावट का खेल शुरू हो जाए, तो त्योहार की मिठास आम नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
हर वर्ष त्योहारों के आसपास खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते हैं। शहरों में कभी-कभार जांच अभियान दिखाई भी देते हैं, लेकिन प्रशासन को इस बार अपनी निगाह केवल बड़े बाजारों और प्रतिष्ठित दुकानों तक सीमित नहीं रखनी चाहिए। सबसे अधिक आवश्यकता ग्रामीण अंचलों, छोटे कस्बों और दूरस्थ बाजारों में निगरानी बढ़ाने की है, जहां बड़ी संख्या में छोटी-बड़ी दुकानों और अस्थायी प्रतिष्ठानों पर मिठाइयों का निर्माण और विक्रय किया जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में मिठाइयों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कई स्थानों पर बड़े स्तर पर उत्पादन होता है, लेकिन वहां इस्तेमाल किए जा रहे दूध, मावा, घी, तेल, रंग, चांदी के वर्क और अन्य सामग्री की शुद्धता की नियमित जांच कितनी होती है, यह गंभीर विचार का विषय है। खाद्य सुरक्षा केवल शहरों में रहने वाले नागरिकों का अधिकार नहीं है। गांव में रहने वाला व्यक्ति भी उतनी ही शुद्ध और सुरक्षित खाद्य सामग्री पाने का अधिकारी है जितना किसी बड़े शहर का उपभोक्ता।
चिंता तब और बढ़ती है, जब कम लागत में अधिक लाभ कमाने की होड़ में घटिया या मिलावटी सामग्री के इस्तेमाल की आशंका पैदा होती है। त्योहार की मजबूरी और ग्राहकों की बढ़ती संख्या का फायदा उठाकर मनमाने दाम वसूलना और गुणवत्ता से समझौता करना किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। व्यापारी को लाभ कमाने का पूरा अधिकार है, लेकिन लाभ की सीमा वहीं समाप्त हो जाती है, जहां से उपभोक्ता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ शुरू होता है।
प्रशासन को भी यह समझना होगा कि त्योहार के एक-दो दिन पहले शहर की चुनिंदा दुकानों से नमूने लेना ही पर्याप्त कार्रवाई नहीं मानी जा सकती। यदि वास्तव में मिलावट रोकनी है तो खाद्य सुरक्षा विभाग, स्थानीय निकाय और संबंधित अधिकारियों को अभी से संयुक्त अभियान प्रारंभ करना चाहिए। मिठाई निर्माण स्थलों की जांच हो, कच्चे माल के स्रोत देखे जाएं, मावा और दूध से बने उत्पादों के नमूने लिए जाएं तथा खाद्य रंग और तेल-घी की गुणवत्ता की भी पड़ताल की जाए।
विशेष रूप से उन स्थानों पर नजर रखी जानी चाहिए जहां त्योहार के कुछ दिन पहले अचानक बड़े पैमाने पर मिठाइयों का उत्पादन प्रारंभ हो जाता है। केवल दुकान के काउंटर पर सजी सुंदर मिठाई देखकर उसकी गुणवत्ता का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। असली सवाल यह है कि वह मिठाई बनी कहां, किन परिस्थितियों में बनी और उसमें इस्तेमाल सामग्री कितनी शुद्ध है।
यहां उद्देश्य ईमानदारी से व्यापार करने वाले मिठाई व्यवसायियों को परेशान करना नहीं होना चाहिए। बल्कि प्रशासन की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि कुछ लोगों की मुनाफाखोरी के कारण पूरे व्यवसाय की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न न लगे। जो व्यापारी गुणवत्ता और स्वच्छता का पालन कर रहे हैं, उन्हें जांच से डरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। कार्रवाई उन लोगों पर होनी चाहिए जो नियमों को दरकिनार कर उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को जोखिम में डालते हैं।
साथ ही बाजार में मिठाइयों के दामों में असामान्य अंतर भी प्रशासन और उपभोक्ता दोनों के लिए सतर्कता का संकेत होना चाहिए। अत्यधिक सस्ती मिठाई किस सामग्री से तैयार की गई है और अत्यधिक कीमत वसूलने वाले प्रतिष्ठान ग्राहकों को वास्तव में कैसी गुणवत्ता दे रहे हैं, इसकी भी निगरानी आवश्यक है। मूल्य और गुणवत्ता दोनों में पारदर्शिता उपभोक्ता का अधिकार है।
रक्षाबंधन आने के बाद कार्रवाई शुरू करने से बेहतर है कि प्रशासन त्योहार से पहले ही रोकथाम की व्यवस्था मजबूत करे। जांच दल ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचे, आकस्मिक निरीक्षण हों और संदिग्ध सामग्री मिलने पर नमूने लेकर नियमानुसार त्वरित कार्रवाई की जाए। कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए, बल्कि उसका असर बाजार में दिखाई देना चाहिए।
आम नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। केवल रंग, चमक और कम कीमत देखकर मिठाई खरीदने के बजाय स्वच्छता, गुणवत्ता और विश्वसनीयता को प्राथमिकता दें। संदेहास्पद खाद्य सामग्री की जानकारी संबंधित विभाग तक पहुंचाना भी जागरूक नागरिक का दायित्व है।
प्रशासन के सामने इस रक्षाबंधन एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण कसौटी है—क्या उसकी सतर्कता केवल शहर के मुख्य बाजार तक दिखाई देगी, या गांव की उस छोटी दुकान और मिठाई निर्माण इकाई तक भी पहुंचेगी जहां हजारों ग्रामीण उपभोक्ताओं का स्वास्थ्य जुड़ा हुआ है?
त्योहार खुशियां बांटने के लिए होते हैं, बीमारी बांटने के लिए नहीं। इसलिए रक्षाबंधन की मिठास सुरक्षित रखने के लिए अभी से ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि बाजार में बिकने वाली हर मिठाई के साथ उपभोक्ता को स्वाद के साथ शुद्धता का भरोसा भी मिले। प्रशासन की समय पर की गई सख्ती न केवल मिलावटखोरों पर अंकुश लगाएगी, बल्कि ईमानदार व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं—दोनों के हितों की रक्षा करेगी।




